आरक्षण की मांग को लेकर आजकल हार्दिक पटेल सुर्खियों में हैं....उनकी मांग है कि पटेलों यानी पाटीदार समुदाय को ओबीसी आरक्षण दिया जाए...मेरा सवाल ये है कि राज्य के 20% पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग कितनी जायज है जबकि गुजरात के 182 विधायकों में 42 पटेल समाज से हैं... राज्य के कुल 26 सांसदों में से 6 पटेल हैं... अब तक गुजरात में 4 मुख्यमंत्री पटेल समाज से रहे हैं... मौजूदा मुख्यमंत्री आनंदी बेन भी पटेल समाज से हैं... गुजरात सरकार के 7 मंत्री पटेल समाज से हैं... गुजरात में प्रमुख बिल्डर्स, दिग्गज हीरा व्यवसायी पटेल हैं... US में पटेल सरनेम, सबसे प्रचलित 500 की लिस्ट में 174वें स्थान पर हैं....तो ऐसी स्थिति में पाटीदारों यानी पटेलों के लिए आरक्षण की मांग का मतलब क्या है....ये तो एक बहाना मात्र है अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का...कहा जाता है कि आरक्षण पिछड़ी जातियों में पैदा हुए लोगों को ऊपर उठाने का एक सशक्त हथियार है...लेकिन ऊंची जातियों में पैदा होने वाले गरीब बच्चों को ऊपर उठाने का कौन सा उपाय है....हमने बहुत सारे ऐसे ऊंची जाति के बच्चों को देखा है जो सिर्फ गरीब होने की वजह से पढ़ नहीं पाते हैं...उन्हें आरक्षण और शिक्षा की बात तो छोड़िए...पिता की मौत के बाद मां और बहनों के लिए रोटी, कपड़े का जुगाड़ कैसे होगा...इसके लिए शहरों में जाकर फैक्ट्री में मजदूरी करना पड़ता है...बहनों की पढ़ाई छूट जाती है...किसी मौसी, मामा, पड़ोसी या चाचा ने मदद कर दी तो ठीक नहीं तो बस जीवन की गाड़ी खींचनी पड़ती है...यही स्थिति किसी दलित या पिछड़ी जाति के परिवार की हो तो तमाम सामाजिक योजनाएं हैं...जो परिवार के हर सदस्य का ख्याल रखने के लिए लगभग हर राज्य में हर सरकारों ने चला रखी हैं...कोई भी चुनाव हो...कोई भी नेता हो, कोई भी सरकार हो..सब दलितों के लिए ही मरते हैं..कुछ ज्यादा सेक्युलर हो गए तो मुसलमानों के लिए मरने लगे...मेरा सवाल है कि अगड़े गरीबों के लिए कौन है? कौन है जो अगड़ों की मौत पर आंसू बहाने आए..
I wish to thank all readers of my blog, especially those who gave me support by writing critical or encouraging commen
Wednesday, August 26, 2015
Thursday, August 9, 2012
बिना मकसद के खत्म हुआ अन्ना का टेंशन
सरकार की सोलह महीने पुरानी टेंशन खत्म हो गई....ले के रहेंगे जनलोकपाल बिल के नारे के साथ सरकार को चुनौती देने उतरी टीम अन्ना का कोई अब अस्तित्व ही नहीं बचा...दिलचस्प बात तो ये है कि...मकसद तो हासिल हुआ नहीं...नई सियासी पार्टी बनाने की घोषणा कर दी गई....नई उर्जा, नये जोश के साथ सड़कों पर अन्ना के समर्थन के लिए उतरे नौजवानों का सारा उत्साह भी काफूर हो गया... बेचारे मनमसोस कर रह गये...लेकिन सबसे ज्यादा मजा सरकार को आय़ा....सरकार के लिए सरदर्द बने बिन बुलाये मेहमान अन्ना की टीम ने जो नाक में दम कर रखा था वो टेंशन खत्म हुई,..अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि...क्यों 76 के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन कहे जाने वाले आंदोलन की ये परिणति हुई।....क्यों अन्ना की ये मुहिम बिना रंग दिखाये खत्म हो गई....इसका जवाब जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा....ये इस सरकार की या यूं कहें कि...केन्द्रीय गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम के अतिउत्साह का ही दुष्परिणाम था कि...अन्ना हीरो बन गये औऱ सरकार विलेन....अन्ना को आंदोलन के लिए जगह देने की बजाये तिहाड़ में डालना सरकार की सबसे बड़ी भूल थी.. चार जून को रामदेव के साथ रामलीला मैदान में हुई घटना ने भी अन्ना के आंदोलन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई।...लेकिन जब सरकार को अपनी भूल का अहसास हुआ तो केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय के अलावा अन्ना हजारे के आमरण अनशन पर बैठने को भी कोई भाव नहीं दिया..न कोई जबर्दस्ती, न कोई भाव देने वाला बयान...टीम अन्ना को लगा कि,...इस अनशन का कोई अंत नहीं है...शायद जिद में केजरीवाल, सिसोदिया औऱ गोपाल राय की जान भी चली जाये...तब टीम अन्ना ने कोई रास्ता न देखकर आंदोलन खत्म करना ही बेहतर रास्ता समझा...तब सवाल था कि...सरकार तो मानी नहीं...आंदोलन इतने दिनों तक चला...इसे खत्म कैसे करें....तब एक ऐसा शिगूफा छोड़ा गया कि..सांप भी मर जाये...और लाठी भी टूट जाये... चुनाव में उतरकर सरकार से लड़ने का ऐसा शिगूफा छोड़ा गया कि....जनता सोचती रह जाये और आंदोलन को खत्म करने का रास्ता भी चुन लिया जाये....ठीक ऐसा ही हुआ।..लोग ये सोचने लगे कि...अब पार्टी बनेगी...सरकार में टीम अन्ना आयेगी और लोकपाल बनायेगी...लेकिन ये ऐसी दूर की कौड़ी है कि....जब तक ये सब होगा...लोग बाकी चीजों की तरह इसे भी भूल जायेंगे...और इन सबके बीच अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, गोपाल राय, योगेन्द्र, शाजिया और न जाने कौन कौन सेलिब्रेटी बन गये....जनलोकपाल बना न बना....टीम अन्ना का भला हो गया और अन्ना हजारे अपने पुराने मठ में लौट गये....लोग भविष्य की तैयारियों के बारे में सोचने लगे...सरकार बला टलने पर जश्न मनाने लगी...और टीम अन्ना के सदस्य बिना टीम के सेलिब्रेटी हो गये...
Thursday, May 12, 2011
धत् बुर्बक...राहुल गांधी

कांग्रेस के इस युवराज को कभी कभी आम आदमी की याद आ जाती है...लेकिन वो भी कभी कभी....मजेदार बात ये है कि...आम आदमी के नाम पर लड़ने का दिखावा करने वाला ये राहुल बाबा के इस पैंतरे कॉ मायावती ने बुरी तरह कुचल दिया....यूपी की हर बड़ी घटना के चार दिनों बाद घटनास्थल पर पहुंचने वाले भारत के इस नये-नवेले राजनीतिज्ञ को भट्टा परसौल की घटना से थोड़ी फुटेज मिली....महिलाओं को सांत्वना दी...लोगों के दुख दर्द बांटने की एक्टिंग की....धरना पर भी बैठे..मगर आपको याद दिला दें कि...यही राहुल गांधी थे...जिन्होंने अन्ना हजारे के अनशन को हीरोगिरी कहा था.. और कहा था कि...धरने पर बैठने से समस्यायें खत्म नहीं होती....आज हम इस कांग्रेस के दुलारे लेकिन बुर्बक महासचिव से पूछना चाहते हैं कि...आपका ये धरना हीरोगिरी नहीं तो क्या है....आपको गैर कांग्रेसी सरकारों में ही किसानों और महिलाओं पर अत्याचार क्यों नजर आता है...؟आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान आपको याद नहीं आते हैं...आंध्र प्रदेश में तो महिलाओं पर गोलियां तक चलाई जाती हैं....तब राहुल बाबा को न गोलियों की आवाज सुनाई देती है..न किसानों की समस्या दिखाई देती है,....मिशन यूपी-2012 की तैयारी में लगे राहुल गांधी ने शायद बिहार के चुनाव से कुछ भी नहीं सीखा....खैर अगले साल जनता उनको और उनकी औकात बतायेगी..
Tuesday, May 3, 2011
दिग्गी के कमीने बोल

कांग्रेस के इस वाचाल महासचिव दिग्विजय सिंह मुसलमानों का वोट अपनी पार्टी को खुश करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं....कभी बाटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल उठाने के बाद आजमगढ़ जाकर आतंकियों के परिजनों को सांत्वना देते हैं तो कभी मुम्बई हमले में मारे गये मुम्बई एटीएस के चीफ हेमंत करकरे की मौत के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ बताते हैं...इतना होता तो फिर भी काफी था॥लेकिन इस आतंकियों के पैरोकार को अब अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादियों से भी लगाव होने लगा है॥ओसामा की हत्या के बाद उसके उचित अंतिम संस्कार की वकालत करने वाले दिग्विजय सिंह का मुसलमानों को बरगलाने का ये हथकंडा पुराना पड़ गया है॥मुसलमान भी इस महाराजा की गंदी नीयत को समझ चुके हैं॥लेकिन ये बेशर्मी की हर हद पार करते हुए किसी को भी गाली देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं,...इनकी मालकिन सोनिया भी दूसरे धर्मों के लोगों को दिखाने के लिए अपने इस पालतू बेगैरत और बेवकूफ महासचिव को बुलावा भेज देती है....लेकिन बाहर निकलने के बाद भी ये अड़ियल मध्यप्रदेश का पूर्व मुख्यमंत्री सीना ठोककर अपनी बात पर कायम रहने की बात करता है....हमें तो शायद यही लगता है कि...मुकेश चंद्र शर्मा की शहादत को भूलकर आजमगढ़ जाने वाला ये राजनीतिज्ञ अब सउदी अरब जाकर ओसामा की मौत पर आंसू बहायेगा औऱ अपने सर मुड़ायेगा...मगर समस्या ये है कि,...इसे सबक सिखाने वाला कोई नहीं मिल रहा॥जय हिन्द....
Sunday, February 6, 2011
Sunday, January 16, 2011
लालचौक पर तिरंगा फहराने की भाजपा की घोषणा..राजनीति या चुनौती

भाजपा ने घोषणा कर दी है कि...२६ जनवरी २०११ को उसकी युवा ईकाई श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहरायेगी...जिसे कांग्रेस औऱ नेशनल कांफ्रेंस की सरकार राजनीति करार दे रही है... लेकिन मेरा सवाल है कि...अलगाववादियों के डर से जम्मू-कश्मीर को अपने देश के अखंड हिस्सा मानने वाले कांग्रेसी क्यों नहीं भाजपा के इस कदम का समर्थन कर रहे हैं....क्यों नहीं, अलगाववादियों के मुंह पर करारा तमाचा मारने की भाजपा के युवा नेता अनुराग ठाकुर की इस घोषणा का स्वागत कर रही....शायद इसमें कांग्रेस की गलती नहीं...क्योंकि उसे तो करारा तमाचा खाने की आदत है...कभी चीन की तो कभी पाकिस्तानी कबायलियों की...तो कभी नई दिल्ली में केन्द्र सरकार के नाको के नीचे सरेआम कश्मीर की आजादी की वकालत करने वाले अलगाववादियों की...उदाहरण तो कई हैं...किस किस को गिनाऊं...कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था करती कि....भाजपा कई आतंकवादी घटनाओं का गवाह रहे लालचौक पर झंडा फहरा सके...आपको बता दें कि...इस लालचौक पर देश के दुश्मन अलगाववादियों के डर से प्रदेश सरकार ने देश की शान तिरंगा झंडा फहराना बंद कर दिया है...जम्मू-कश्मीर सरकार का तर्क है कि॥बड़ी मुश्किल से प्रदेश में पत्थरबाजों से निजात मिली है इस घटना से वहां फिर से स्थिति असामान्य हो सकती है...एनडीए सरकार में मंत्री रह चुके उमर अब्दुल्ला जी से...मेरा नम्र निवेदन है कि...छोड़ दो उस प्रदेश की गद्दी॥जिसके पत्थरबाज नागरिकों को तुम काबू में नहीं कर सकते...जहां की स्थिति मात्र इसलिए खराब हो सकती है...कि देश के शान तिरंगे को कोई फहराने की कोशिश वहां करेगा॥
अगर अनुराग ठाकुर वहां झंडा फहरा देने में सफल होते हैं तो वे लाखों करोड़ों राष्ट्रवादी लोगों के लिए आदर्श कायम करेंगे...आपको बता दें कि...इससे पहले जम्मू-कश्मीर की भाजपा ईकाई ऐसी कोशिश कर चुकी है॥लेकिन प्रदेश सरकार ने बड़ी बहादुरी से इनकी इच्छाओं को कुचल दिय़ा था और पत्थरबाजों को काबू में करने में उसी सरकार को तीन महीने लगे...जिसमें सौ से ज्यादा लोग मारे गये...चलते-चलते...."जय हिंद॥"
कांग्रेस की चुनौती..बढ़ा दी है महंगाई...जो करना है कर लो...
पहले प्याज फिर टमाटर और दूसरी चीजें...अब पेट्रोल भी महंगा हो गया....क्या कर रही है सरकार...कितना चूसेगी लोगों का खून,...पहले कहा जाता था ये महंगाई गरीबों को मार डालेगी...लेकिन "यूपीए-टू की कल्याणकारी योजनाओं" से महंगाई इतनी बढ़ गई कि...अब सामाजिक सद्भाव भी पैदा हो गया...क्योंकि क्या गरीब क्या मध्यम वर्ग॥सब महंगाई डायन(सोनिया डायन...ओफ्फ्फ ये मैं नहीं कह रहा...बल्कि यूपी के शिक्षामंत्री का ये जुमला है...) के शिकार हो गये॥।इसलिए समाज का हर तबका सरकार को कोस रहा है...पहले तो करोड़ों अरबों डकारे...कार्रवाई के नाम पर उनसे गद्दी ले ली...उनकी जगह किसी और को बिठा दिया....और अब महंगाई के नाम पर जनता का खून चुसने में लगे हैं... उधर, महंगाई के मुद्दे पर प्रधानमंत्री समेत सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की दो दो तीन-तीन दिन बैठक हुई...लोगों ने समझा कि॥बैठक बेनतीजा समाप्त हो गई।॥लेकिन ये बैठक का ही असर था कि...प्याज के आंसू रो रही जनता को अब पेट्रोल की कीमतों में हुई ढ़ाई रूपये की बढ़ोतरी से भी दो चार होना पड़ेगा....अपनी यूपीए सरकार तो ऐसी है कि॥मानो जनता को चुनौती दे रही हो कि...बढ़ा दी है महंगाई॥जो करना हो कर लो...
दिलचस्प बात तो ये है कि॥जब पच्चीस दिसंबर को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्य महंगाई दर १८.३२ फीसदी हुई तो वित्तमंत्री को इसकी जानकारी तक नहीं थी॥नई दिल्ली में पत्रकारों ने जब उनसे जानना चाहा कि...मंत्री जी खाद्य महंगाई दर तो इतनी हो गई है....तो उनका जवाब था कि...कितना...? ओहो..१८.३२ फीसदी...अच्छा तब तो ये चिंता की बात है...लेकिन अगले ही हफ्ते जब इस सरकारी आंकड़े में मात्र डेढ़ फीसदी की कमी आई॥तो पत्रकारों को उनसे पूछने की भी जरूरत नहीं पड़ी...खुद गाड़ी से निकले॥और कहा कि॥खाद्य महंगाई दर में डेढ़ फीसदी की कमी आ गई है....लेकिन सवाल उठता है कि... इन आंकड़ों का आम आदमी करे तो क्या करे...सब्जियां तो ऐसी महंगी हुई हैं कि...डॉक्टरों की हरी सब्जियां खाने की सलाह भी मरीज नहीं मान सकेंगे...अब पेट्रोल पर सरकारी नजरें टेढ़ी हुई हैं....अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों का हवाला देते हुए जनवरी महीने में ही दोबारा पेट्रोल की कीमतों में ढ़ाई रुपये की बढ़ोतरी कर दी...भाजपा ने इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है तो कांग्रेस ने बेशर्मी का परिचय देते हुए सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है....आम आदमी के नाम पर सत्ता में आने वाली कांग्रेस ने एक तरफ तो आम आदमी का बेड़ा गर्क तो किया ॥दूसरी। तरफ भ्रष्टाचारियों को जी-जान से बढ़ावा दिया....इस बेशर्म सरकार की ढ़ीठता देखिये....महंगाई बढ़ने का कारण उसे अपनी तथाकथित जन कल्याणकारी योजनायें लगती हैं...जिसकी वजह से गरीब आदमी दो वक्त की रोटी खाने लगा है और उसका जीवन-स्तर सुधरा है...और आम आदमी के पास पैसे आने के बाद वो नई नई चीजें खरीद रहा है...इसलिए चीजों के दामों में बढ़ोतरी हो रही है...
इस कांग्रेस सरकार से मेरा तो यही आग्रह है कि... अमां यार...बंद करो अपनी ये तथाकथित जनकल्याणकारी योजनायें...जिससे महंगाई तो बढ़ ही रही है...भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर जा पहुंचा है॥औऱ जिस व्यक्ति को वो फायदा पहुंचने की बात कर रहे हैं॥कभी पैर जमीन पर तो उतारो॥सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुए सत्ता के ...., वो फायदा तमाम राजनेताओं, नौकरशाहों और पंचायती व्यवस्था में सत्ता संभाले लोगों तक ही सिमटा पड़ा है...न कि आम आदमी॥जिसके लिए ये योजनायें तथाकथित रुप से चलाई जा रही हैं....
दिलचस्प बात तो ये है कि॥जब पच्चीस दिसंबर को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्य महंगाई दर १८.३२ फीसदी हुई तो वित्तमंत्री को इसकी जानकारी तक नहीं थी॥नई दिल्ली में पत्रकारों ने जब उनसे जानना चाहा कि...मंत्री जी खाद्य महंगाई दर तो इतनी हो गई है....तो उनका जवाब था कि...कितना...? ओहो..१८.३२ फीसदी...अच्छा तब तो ये चिंता की बात है...लेकिन अगले ही हफ्ते जब इस सरकारी आंकड़े में मात्र डेढ़ फीसदी की कमी आई॥तो पत्रकारों को उनसे पूछने की भी जरूरत नहीं पड़ी...खुद गाड़ी से निकले॥और कहा कि॥खाद्य महंगाई दर में डेढ़ फीसदी की कमी आ गई है....लेकिन सवाल उठता है कि... इन आंकड़ों का आम आदमी करे तो क्या करे...सब्जियां तो ऐसी महंगी हुई हैं कि...डॉक्टरों की हरी सब्जियां खाने की सलाह भी मरीज नहीं मान सकेंगे...अब पेट्रोल पर सरकारी नजरें टेढ़ी हुई हैं....अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों का हवाला देते हुए जनवरी महीने में ही दोबारा पेट्रोल की कीमतों में ढ़ाई रुपये की बढ़ोतरी कर दी...भाजपा ने इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है तो कांग्रेस ने बेशर्मी का परिचय देते हुए सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है....आम आदमी के नाम पर सत्ता में आने वाली कांग्रेस ने एक तरफ तो आम आदमी का बेड़ा गर्क तो किया ॥दूसरी। तरफ भ्रष्टाचारियों को जी-जान से बढ़ावा दिया....इस बेशर्म सरकार की ढ़ीठता देखिये....महंगाई बढ़ने का कारण उसे अपनी तथाकथित जन कल्याणकारी योजनायें लगती हैं...जिसकी वजह से गरीब आदमी दो वक्त की रोटी खाने लगा है और उसका जीवन-स्तर सुधरा है...और आम आदमी के पास पैसे आने के बाद वो नई नई चीजें खरीद रहा है...इसलिए चीजों के दामों में बढ़ोतरी हो रही है...
इस कांग्रेस सरकार से मेरा तो यही आग्रह है कि... अमां यार...बंद करो अपनी ये तथाकथित जनकल्याणकारी योजनायें...जिससे महंगाई तो बढ़ ही रही है...भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर जा पहुंचा है॥औऱ जिस व्यक्ति को वो फायदा पहुंचने की बात कर रहे हैं॥कभी पैर जमीन पर तो उतारो॥सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुए सत्ता के ...., वो फायदा तमाम राजनेताओं, नौकरशाहों और पंचायती व्यवस्था में सत्ता संभाले लोगों तक ही सिमटा पड़ा है...न कि आम आदमी॥जिसके लिए ये योजनायें तथाकथित रुप से चलाई जा रही हैं....
Saturday, December 11, 2010
स्वामी का सनसनीखेज खुलासा
टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय और केन्द्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से फटकार दिलवाने वाले जनता पार्टी ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के भी इस घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया है....इस घोटाले में शुरू से ही सक्रिय भूमिका निभाने वाले स्वामी ने सोनिया गांधी को बहनों को इस मामले में घूस दिये जाने का आरोप लगाया है..
करकरे पर दिग्गी की किरकिरी
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर वोट बैंक की राजनीति के लिए सारी सीमाय़ें तोड़ दी हैं॥बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल उठाने के बाद अब उन्होंने मुम्बई हमले में शहीद हुए एटीएस चीफ हेमंत करकरे की मौत की दिशा को किसी और तरफ मोड़ने की कोशिश की है...उन्होंने कहा है कि....मुम्बई हमले से तीन से चार घंटे पहले करकरे ने उनसे अपनी जान पर मालेगांव के आऱोपियों के समर्थकों द्वारा खतरा बताया था....हालांकि, दिग्विजय के इस बयान से खुद उनकी पार्टी ने पल्ला तो झाड़ ही लिया है....जिसे घोटालों के महाजाल से निकालने की कोशिश में मीडिया और विपक्ष का ध्यान भटकाने की कोशिश में उन्होंने ये बयान दिया है...वहीं, विपक्ष ने कांग्रेस के इस लाड़ले और विवादास्पद महासचिव औऱ मुल्ला मुलायम की राह पर चल रहे दिग्गी राजा को जमकर लताड़ लगाई है,,,जहां भाजपा महासचिव रविशंकर प्रसाद ने उनसे अपील की है कि....घटिया राजनीति के लिए देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ न करें वहीं, पार्टी उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नक़वी ने उनके बयान को ठीक वैसा करार दिया है जैसे पाकिस्तान में आतंकवादियों के प्रवक्ता दिया करते हैं....मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और यूपी में कांग्रेस की वापसी के लिए कमान संभाले दिग्विजय को हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने भी लताड़ लगाई है,,,उन्होंने कहा है कि...देश की सुरक्षा के लिए जान देने वाले हेमंत की जान पर राजनीति नहीं होनी चाहिए....भाजपा नेता विनय कटियार ने तो दिग्गी राजा का मानसिक संतुलन खराब हो जाने की संभावना जताई है...दिग्गी राजा॥राजनीति के लिए इतना नीचे तो ना गिरो...कि, जब उठने की भी कोशिश करो तो जनता तुम्हें उठने ही न दें...धन्यवाद..
Thursday, December 9, 2010
इंडियन मुजाहिद्दीन का मेल पढ़ें
प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने यही मेल मीडिया हाउसों को बनारस धमाके के तुरंत बाद भेजा था....इस मेल को पढ़ने के बाद साफ हो जाता है कि,...भारत सरकार की नीतियां और देश में होने वाली हर गतिविधियों पर इनकी नज़र रहती है...जिसका बदला लेने के लिए य़े किसी भी हद तक जाने को तैय़ार हैं..
Sunday, December 5, 2010
घोटालों का मौसम
देश में आजकल घोटालों का मौसम चल रहा है...हर कांग्रेसी घोटालोंबाजों को बचाने में लगा है तो भाजपा का हर नेता सरकार को आड़े हाथों ले रहा है...सरकार जेपीसी की मांग नहीं मान रही है...और विपक्ष इस पर अड़ा हुआ है...नतीजन संसद की कार्यवाही पंद्रह दिनों तक बाधित हो चुकी है...देश को करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका है...लेकिन सवाल उठता है कि...दोनों अपनी जिद पर क्यों अड़े हुए हैं...जहां विपक्ष जेपीसी के द्वारा प्रधानमंत्री समेत घोटाले में शामिल हर मंत्री से पूछताछ कराना चाहता है॥वहीं, प्रधानमंत्री की निष्क्रियता समेत केन्द्रीय सतर्कता आयोग के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से डांट खा चुकी यूपीए-२ सरकार और बेइज्जती नहीं झेलनी चाहती...लेकिन घोटाला करते समय इन्हें ये याद नहीं रहता कि...जाना एक दिन उसी जनता के दरबार में है॥जिसने उन्हें चुनकर देश की शीर्ष कानून बनाने वाली संस्था में भेजा है...हास्यास्पद बात तो ये है कि...अब सरकार से जुड़े लोग बचाव का रास्ता छोड़ हमले की नीति पर चलने की कोशिश कर रहे हैं...वे एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये के घोटाले, सत्तर हजार करोड़ रुपये के घोटालों को जायज ठहराने के लिए दस साल पहले के बंगारु लक्ष्मण के तहलका मामले का हवाला दे रहे हैं...और वो भी केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना बयान देकर सरकार को और मुश्किलों में ही डाल रहे हैं...
Modi in ETV news





गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी रविवार को हैदराबाद स्थित विश्वप्रसिद्ध रामोजी फिल्म सिटी में थे...सौभाग्य से मैं ईटीवी न्यूज में काम करता हूं॥जो कि रामोजी फिल्म सिटी में ही स्थित है...यहां पर नरेन्द्र मोदी ने अपनी कई वर्षों से दबी उस इच्छा को पूरा किया...जो फिल्मी हस्तियों से सुन सुन के उनके मन में जगी थी॥ उन्होंने रामोजी फिल्म सिटी के हर उस दृश्य का अवलोकन किया...जो फिल्मों में ही लोगों को देखने को मिलता है...इन नजारों को देखकर भाव-भिवोर हुए इस विकासशील पुरुष ने यहां भी रामोजी राव को भविष्य का आईना दिखाते हुए कहा कि...आने वाले दिनों में ये फिल्म सिटी दुनिया के फिल्मकारों की जरुरतों को पूरी करेगी,....गुजरात के इस महानायक ने अपने अमूल्य पलों में से कुछ पल उन पत्रकारों के लिए भी निकाला,,जो दिन रात निस्वार्थ भाव से उन जैसे नेताओं की खबरें चलाते रहते हैं...यहां मोदी की सख्शियत की एक खूबी मैं आपको बताना चाहूंगा कि...कुछ दिन पहले मोदी की पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी भी रामोजी फिल्म सिटी पहुंचे थे...लेकिन उन्होंने सिर्फ रामोजी राव से मुलाकात की...लेकिन मोदी ने अपने प्रदेशों से कई सौ किलोमीटर दूर हैदराबाद में रहकर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत कर रहे पत्रकारों को भी तवज्जो दी...यही अंतर है मोदी और दूसरे नेताओं में...ईटीवी के १२ चैनलों के लिए डेस्कों पर अपनी सेवायें दे रहे पत्रकारों में उनके दौरे को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला....
Wednesday, February 3, 2010
मुंबई में शिवसेना और मनसे की सरकार
मुम्बई शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की बपौती हो गई है,,,,जो भी इसके बारे में बोलेगा...उसका शिवसेना मुंहतोड़ जवाब देगी..मुम्बई में सिर्फ मराठी ही रहेंगे,,,बाहर के लोगों को शिवसेना मुम्बई में घुसने नहीं देगी,,,अगर घुसते हैं तो उन्हें महाराष्ट्र सरकार के कानून के हिसाब से नहीं,,बल्कि शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कानून के हिसाब से चलना होगा,,, मुम्बई पर पूरे देश का हक बताने वालों कोई भी हो...शिवसेना और मनसे उसे नहीं बख्शेगी,,,चाहे वो देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी हों,,, दुनिया का सबसे महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर हों या फिर बॉलीवुड का बादशाह शाहरूख खान... आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खिलाने की वकालत करने के बाद बादशाह खान शिवसेना के सबसे बड़े दुश्मन हो गये हैं....कभी उनपर मुसलमान होने के कारण पाकिस्तानी खिलाड़ियों की वकालत करने का आरोप लगाया जाता है तो कभी कांग्रेस के समर्थन पर ऐसी बातें कहने का आऱोप,,,साथ ही शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक संजय राउत कहते हैं कि,,,वे ऐसा देशभक्ति से प्रेरित होकर कह रहे हैं,,,दिलचस्प बात तो ये है कि,,,शाहरूख खान के बयान के बाद शिवसेना ने धमकी दी कि,,,वे महाराष्ट्र खासकर मुम्बई में किसी भी पाकिस्तानी या ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को नहीं खेलने देंगे,,,अब विदेशों में देश की साख बचाने के लिए जो काम महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री को करना चाहिए,,,वो काम किया केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने,,,उन्होंने विदेशी खिलाड़ियों को भारत में खेलने पर पूरी सुरक्षा देने की गारंटी ली..तो ये बात भी शिवसेना को नगवार गुजरी,,,शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने इस पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि,,,चिदम्बरम भारत के गृहमंत्री हैं या फिर पाकिस्तान के,,,शायद उद्धव के मुंह से ऐसी बातें इसलिए निकल रही हैं कि,,,राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकार की जिम्म्मेदारी होती है ..और केन्द्र विषम परिस्थितियों में ही इस विषय में हस्तक्षेप कर सकता है,,,नहीं..तो वोट बैंक की राजनीति करने वाली प्रादेशिक पार्टियों के इन चोंचलों को केन्द्रीय गृहमंत्री अच्छे तरीके से रोक सकते थे,,,,ये वही गृहमंत्री हैं,,,जिन्होंने 26नवम्बर के आतंकी हमलों के बाद देश में एक भी बड़ा आतंकी हमला, बम विस्फोट नहीं हुआ,,,और देश इस साल पहले के मुकाबले ज्यादा शांतिपूर्ण रहा,,,विदेशी आतंकियों को औकात में लाने वाले चिदम्बरम उद्धव ठाकरे को भी औकात दिखा सकते हैं,,लेकिन हाथ बंधे होने की वजह से ही जूनियर ठाकरे ऐसा पूछने की हिमाकत कर पाते हैं कि,,,चिदम्बरम हिन्दुस्तान के गृहमंत्री हैं या पाकिस्तान के,,,शिवसेना ने अंबानी, तेंदुलकर और खान को तो नहीं ही छोड़ा...कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पर हमला बोलकर उन्होंने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है....राहुल गांधी ने एक दिन पहले बोला कि,,,मुम्बई सबकी है और इसपर हर देशवासी का समान अधिकार है,,,साथ ही उन्होंने कहा कि,,,मुम्बई पर 26 नवम्बर को हुए हमले के वक्त मराठियों की जिसने जान बचाई थी,,वो उत्तर प्रदेश और बिहार के ही थे,,,शिवसेना को ये बात भी नगवार गुजरी..उनके मुखपत्र सामना के वाचाल संपादक संजय राउत ने कहा कि,,,,अगर उत्तर प्रदेश और बिहार के जवान इतने सक्षम हैं तो उन्हें जम्मू-कश्मीर, असम और नक्सलियों से निपटने के लिए आंध्र प्रदेश भेजा जाना चाहिए...अब इन महाशय को कौन बताये कि,,,बिहार यूपी के युवा पूरे देश की रक्षा करने में, प्रशासनिक विभाग में , मीडिया उद्योग में और तकनीकी क्षेत्र में देश के किसी भी राज्य के युवाओं से सबसे आगे हैं.. खैर राउत साहब को ये बात भी नगवार गुजरती है कि,,,मुम्बई के विषय में जिसे चाहे वो ही बोलने लगता है,,, उद्योगपति, खिलाड़ी, कलाकार और राजनेता...इसमें उन्हें साजिश की बू आती है...उन्हें लगता है कि,,,वे अकेले किस किस से लड़ेंगे,,,अरे भाई,,,आपको विधानसभा में तीसरे नंबर पर भेजने वाले मनसे की भी सेवा ले सकते हैं...आप दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता तो पूरे प्रदेश की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर भारी पड़ते हैं,,,,शिवसेना की सिस्टर कन्सर्न कंपनी मनसे(हालांकि,,अभी अंबानी बंधुओं की तरह इनमें भी मेल-मिलाप नहीं है) के कार्यकर्ता तो इतने ताकतवर हैं कि,,,सिद्धिविनायक मंदिर के बाहर ठंड में फुटपाथ पर सोये अस्सी पचासी वर्ष के गरीब साधुओं पर जमकर डंडा बरसाया ,,,इस पार्टी के मालिक राज ठाकरे तो बेचारे मराठी भाईयों के लिए टैक्सी ड्राईविंग की नौकरी पक्की कराने पर तुले हुए हैं,,,,ऐसा लगता है कि,,,देशभक्ति का ठेका, मराठी मानुषों के हितों की रक्षा करने का ठेका इन्हीं दोनों चाचा भतीजों को ही मिला हुआ है,,,शिवसेना के कार्यकर्ताओं के लिए मुम्बई में शिवसेना की सरकार है,,,शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे उनके मुख्यमंत्री हैं...और उनके मुंह से निकला हर वाक्य ब्रह्मवाक्य है और संविधान की धारा है...इस ब्रह्मवाक्य को पूरा करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं,,,शिवसेना ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पर हमला बोला,.तो जवाबी हमला भी आया....महाराष्ट्र से ही आने वाले एक केन्द्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल कहते हैं कि,,,शिवसेना और मनसे की गुंडागर्दी को वे मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकते,,,,लेकिन सवाल उठता है कि,,,लगभग एक दशक से मुम्बई पर राज करने वाली कांग्रेस को अब क्यों उनकी करतूत गुंडागर्दी लगने लगी,,,अभी तक तो वोट बैंक की राजनीति के नाम पर घृणा की इस आग में खूब घी डाला,,,लेकिन जब यही आग केन्द्र सरकार के युवराज और कांग्रेस के पास पहुंची....तो उन्हें बुरा लगने लगा,,,और मूकदर्शक न बन रहने की बात कहने लगे,,,,अब तो ऐसा ही लगता है कि,,,महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार के समानांतर एक और सरकार चल रही है और वो सरकार है शिवसेना और मनसे की सरकार.....
Tuesday, January 26, 2010
६० साल का भारत
भारतीय गणतंत्र आज साठ साल का हुआ। यानी इसके क्या मायने हैं? वह साठ साल का बुड्ढा हुआ या पट्ठा हुआ? अपने गांवों में कहते हैं, साठा सो पाठा। सचमुच 60 साल का भारत अब पट्ठा हुआ जा रहा है। ये 60 साल तो सिर्फ कहने के लिए हैं। ऐसे साठ साल भारत के इतिहास में सैकड़ों बार आ चुके हैं। जब यूनान और रोम, गणतंत्र की सिर्फ कामना करते थे, भारत में गणराज्य या नगर राज्यों की परंपरा काफी पुरानी पड़ चुकी थी। कहीं इस महान परंपरा का प्रभाव ही तो नहीं है, जिसके कारण हमारे गणतंत्र के पिछले साठ साल यूरोप और अमेरिका के गणतंत्रों और लोकतंत्रों से कहीं बेहतर सिद्ध हुए हैं? 26 जनवरी 1950 को भारत ने जो संविधान अपने लिए स्वीकार किया था, वह आज भी दनदना रहा है, जबकि हमारे अड़ोसी-पड़ोसी देशों में उनके संविधान पांच-पांच छह-छह बार बदल चुके हैं। भारत गणतंत्र हुआ, उसके पहले दिन ही हर आदमी और हर औरत को वोट का अधिकार मिल गया, जबकि ब्रिटेन maignakarta (12 15) के बाद इसी काम के लिए 700 साल लग गए, अमेरिका को गृह-युद्ध की विभीषिका से गुजरना पड़ा, अनेक यूरोपीय राष्ट्रों को रक्त-स्नान करना पड़ा और आज भी चीन और रूस जैसे शक्तिशाली और बड़े राष्ट्र लोकतांत्रिक व्यवस्था से काफी दूर हैं। परंपरा की घुट्टी में पिसा हुआ लोकतंत्र का संस्कार हमारे यहां इतना प्रबल है कि भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता है, जबकि उसके आस-पास के कई देशों में या तो फौजी तख्ता पलट हो चुके हैं या वे गृह-युद्ध की गिरफ्त में फंसे हुए हैं। भारत ने लोकतंत्र को जिंदा रखा है और लोकतंत्र ने भारत को जिंदा रखा है। हमारे देखते-देखते कितने देश टूट गए? पाकिस्तान, सोवियत संघ, यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया! कितने ही देश टूटे तो नहीं लेकिन टूटे जैसे दिखाई पड़ते हैं, जैसे अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, सोमालिया, इराक, जार्जिया आदि लेकिन भारत है कि आकार और जनसंख्या में इतना बड़ा होते हुए भी 60 साल से सही-सलामत ही रहा है। बल्कि कुछ बढ़ा है। गोवा और सिक्किम जुड़े हंै। लद्दाख और कश्मीर में कुछ नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन ये क्षेत्र पहले से ही विवादास्पद थे।भारत की लोकतांत्रिकता पश्चिम के राष्ट्रों से इस अर्थ में भी बेहतर है कि वहां फासीवाद और नात्सीवाद का उदय हुआ और उन देशों के दलन के लिए सारे संसार को विश्व युद्ध में उतरना पड़ा लेकिन आपातकाल के थोड़े से बुखार के अलावा भारत का लोकतंत्र कभी किसी अस्पताल में भर्ती नहीं हुआ। साठ साल का हमारा गणतंत्र कितना स्वस्थ और परिपक्व है कि जिस बात पर अमेरिका 200 साल बाद गर्व कर रहा है यानी ओबामा का राष्ट्रपति बनना, वह हमारे यहां गणतंत्र के 17वें साल (1967) में ही हो गया। काबुल के ek dost ne मुझसे पूछा था कि ‘मुल्के-हिंदुस्तान का बादशाह एक मुसलमान कैसे बन गया?’ क्या यह कम बड़ी बात है कि इस देश में राष्ट्रपति दलित होता है, प्रधानमंत्री सिख होता है, उपराष्ट्रपति मुसलमान होता है, लोकसभा का अध्यक्ष एक कम्युनिस्ट होता है और प्रतिपक्ष का नेता पाकिस्तान के सिंध में पैदा हुआ होता है और सारी व्यवस्था ठीक-ठाक चल रही होती है। यह भारतीय गणतंत्र का चमत्कारिक स्वरूप ही है कि इटली में पैदा हुई एक गौरांग महिला सत्तारूढ़ दल की अध्यक्ष है और उसके सम्मान और स्वीकृति में कहीं कोई कसर नहीं है। सहिष्णुता और समन्वय लोकतंत्र का प्राण है और भारत उसका साक्षात प्रमाण है। यदि हम पलटकर देखें तो हमारा सीना गर्व से फूले बिना नहीं रहेगा। 60 सालों में हम कहां से कहां पहुंच गए। जब भारत आजाद हुआ, तब हम सुई भी नहीं बना सकते थे लेकिन अब वही लंगोटधारी भारत हवाई जहाज और रॉकेट बना रहा है, अंतरिक्ष-यान और मोटरें बना रहा है और संसार का छठा परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र बन गया है। कुछ ही वर्षो में वह दुनिया की तीसरी आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। 36 करोड़ लोगों का भारत अब 116 करोड़ का हो गया है लेकिन उसके नेताओं को अब अनाज और डॉलरों के लिए किसी मालदार देश के सामने झोली नहीं फैलानी पड़ती। अब तो यह विचार भी हवा में तैर रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरह हर नागरिक को भोजन का अधिकार भी मिले। 1950 में भारत में प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 255 रुपए थी। आज वह 37,500 रुपए है। पहले सिर्फ 16 प्रतिशत लोग साक्षर थे, अब 68 प्रतिशत हैं। जो भारत कल तक यूरोप के छोटे-छोटे देशों से कर्ज मांगता था, आज उसने अफगानिस्तान में 6-7 हजार करोड़ खर्च किए हैं और हाल ही में बांग्लादेश को 4,500 करोड़ रुपए का अनुदान दिया है। आर्थिक प्रगति तो चीन ने भी की है लेकिन चीन में नागरिक अपने मुंह का इस्तेमाल सिर्फ खाने के लिए करते हैं, भारत की तरह बोलने के लिए भी नहीं। इसके अलावा चीन में भारत के मुकाबले अमीरी-गरीबी की खाई कई गुना अधिक गहरी है। भ्रष्टाचार में भी वह हमसे आगे है। चीन को भारत बनने में अभी कई दशक लगेंगे लेकिन चीन जैसी आर्थिक प्रगति करने में भारत को एक दशक भी नहीं लगेगा। हमारे गणतंत्र की जवानी का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा? हम जरा कल्पना करें कि हमारा गणतंत्र अब से 40 साल बाद कैसा लगेगा? शतायु तक पहुंचते-पहुंचते वह पूर्ण महाशक्ति बन जाएगा। उन राष्ट्रों से भी बेहतर, जो आज महाशक्तियां कहलाते हैं। ये महाशक्तियां भयंकर महाशक्ति हैं। भारत भयंकर नहीं, प्रियकर महाशक्ति बनेगा। भारत महाशक्ति बनता चला जा रहा है लेकिन इस नए विराट रूप में ढलने के लिए न तो वह अपनी जनता का खून पी रहा है और न ही उसने उपनिवेश खड़े किए हैं। कोई भी सच्च लोकतांत्रिक राष्ट्र ऐसा नहीं कर सकता। उसके कुछ नेता या स्वार्थी तबके ऐसा करना चाहें तो भी वे सफल नहीं हो सकते, क्योंकि हर नागरिक को समान मताधिकार है और जनता जागरूक है। ऐसा भारत ज्यों-ज्यों मालदार और ताकतवर होता चला जाएगा, उसकी समृद्धि उसके लोगों में बंटेगी और वह दुनिया के जरूरतमंद राष्ट्रों का सहोदर सिद्ध होगा। उसका रास्ता वह नहीं होगा, जो चीन और अमेरिका का है। उसका अपना और नया रास्ता होगा। साठ वर्ष का यह युवा गणतंत्र जब सौ वर्ष का होगा तो इसकी जवानी अपने शिखर पर होगी। तब क्या भारत में कोई भूखा सोएगा? तब क्या भारत में कोई निरुत्तर होगा? तब क्या ठंड में कुछ लोग सुबह सड़क पर मरे हुए पाए जाएंगे। क्या कोई आदमी इसलिए दम तोड़ेगा कि उसका इलाज न हो सका? नहीं, ऐसा नहीं होगा। जो होगा वह अजूबा होगा। समय के इतिहास में एक विलक्षण गणतंत्र का उदय होगा।
Friday, January 15, 2010
महंगाई का ज्योतिष..
बहुत पहले एक कहावत सुनी थी...अब क्या चुपचाप बैठे हो, महंगाई के असोरा (बरामदा) में...राशन झोला में और पैसा बोरा में..आज की स्थिति देखकर पहले बचपन में सुनी गयी वो कहावत आज भी कितनी सही साबित हो रही है...मज़ेदार बात तो ये है की माननीय कृषि मंत्री कभी इसके लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराते हैं तो कभी कहते हैं की मैं ज्योतिषी नहीं हूँ...भैया...फिर क्या करने बैठे हो....कृषि मंत्रालय में... माना, महंगाई सिर्फ देश में ही नहीं है...हर जगह है...कच्चे तेल की कीमतें ८० डोलोर प्रति बैरल पहुँच गयी है...लेकिन आप कैसी सरकार चला रहे हैं... निजी कम्पनियां फायदा कमा रही हैं...सरकार घाटे में है....आम आदमी परेशान है....गोदामों में गेहूं सड़ रहा है....दाल की फसल कहीं ढंग से नहीं हो रही है आखिर क्यों....इसका जवाब तो आप ही को देना पड़ेगा न मंत्रीजी... कम से कम दाल चावल के साथ ऐसी ब्यवस्था तो कीजिये की आम जनता सुबह सुबह उठकर एक प्याली चाय पिने के पहले ये तो न सोचे कि...चलो छोडो न पीते हैं...नहीं तो चीनी ख़तम हो जाने पे पचास का एक नोट खर्च हो जायेगा...कैसे मंत्री हैं....बाकि हर चीज़ तो महँगी है ही ...किताब कॉपी...पेन पेंसिल...सेन्ट, क्रीम,,यहाँ तक कि एक सेट पैंट शर्ट खरीदने जाते हैं तो कम से कम हज़ार रुपये तो रखने ही पड़ते हैं....जूते तो 1200-1500- के नीचे के ढंग के मिलते ही नहीं..लेकिन फिर भी भारत की सहनशील जनता सब कुछ सहने के लिए तैयार है....तो माननीय पवार साहब...पेट पर हो रहे हमले को रोक लीजिये...नहीं तो हिन्दुस्तानियों ने तो २०० साल की अंगरेजी सरकार को उखाड फेंका था...आपकी यूपीए सरकार किस खेत की मूली है...
Saturday, January 9, 2010
दम तोड़ता रहा जवान....देखते रहा जमघट





तमिलनाडु के तिरूनेलवली में शुक्रवार यानि आठ जनवरी को ऐसी घटना घटी,,,जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया...तमिलनाडु पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर को कुछ लोगों ने देशी बम मारकर मोटर साइकिल से गिरा दिया...फिर नारियल काटने वाले हंसिया से उसके पैर काट दिये और सिपाही के गर्दन पर भी वार किया,,,,इस सबके बावजूद सिपाही के हौंसले में कोई कमी नहीं आई और वो खुद मदद के लिए उन लोगों को बुलाता रहा जो उसके इस हाल का तमाशा देख रहे थे,,,लेकिन क्या मजाल कि कोई उसकी सहायता के लिए आगे आता,,,,पैर कटा, बम से जख्मी और गर्दन पर वार झेले पुलिस सब इंस्पेक्टर के दर्द की इतनी ही इन्तिहा नहीं रही,,,दुख तो तब हुआ जब तमिलनाडु सरकार के तीन तीन मंत्री अपने काफिले के साथ उस हृदयविदारक घटना को देखते रहे....बाद में पता नहीं, भगवान की कृपादृष्टि हुई या उन्हें खुद-ब खुद सद्बुद्धि आ गई,,,उनमें से कुछ लोग आगे बढ़े और उस जाबांज को अस्पताल ले गये,,,लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी,,,वो जवान मौत को गले लगा चुका था....सवाल उठता है कि क्या सेवा को धर्म मानने वाले देश में इस तरह की घटना बर्दाश्त करने लायक है,,,और खास कर उस इंसान के लिए..जो मरने तक लोगों की सुरक्षा और सेवा के लिए प्रतिबद्ध था,,,पैर कटने और गर्दन पर वार झेलने के बावजूद वो जवान उट कर बैठा,,,लोगों को सहायता के लिए हाथ हिला हिला कर बुलाता रहा,,,कहां गई थी,,,इंसानियत...कहां गई थी मानवता,,,क्या किसी को तरस नहीं आय़ा...उन नेताओं का जमीर कहां सोया था,,,जिनकी सुरक्षा में लगे पुलिस और सुरक्षा बल के जवान दिन रात लगे रहते हैं और अपनी जान तक की परवाह नहीं करते,.,,,बताया जा रहा है कि,,,वो सब इंस्पेक्टर किसी और के चक्कर में जान गंवा बैठा...लेकिन क्या तमिलनाडु में इस तरह किसी को मारे जाने को जायज ठहराया जा सकता है...चाहे वो पुलिस का जवान हो या कोई और,,,इस घटना को देखने के बाद तो यही लगता है कि,,,हम इक्कसवीं सदी के भारत में नहीं, बल्कि बर्बर युग में रह रहे हैं,,,,जरूरत इस बात की है कि,,,मारने वाले को तो इतनी कड़ी सजा दी जाये कि,,,दूसरा कोई इस तरह का घिनौना कारनामा करने से पहले एक हजार बार सोचे...और छोड़ना उन नेताओं को भी नहीं चाहिए,,,जो उस जवान की मौत का तमाशा देखते रहे,,,
Friday, January 8, 2010
जम्मू से सेना हटाने का फैसला
जम्मू कश्मीर से सरकार ने सेना हटाने का फैसला किया है...जो की किसी भी स्थिति में सही नहीं कहा जा सकता...कहा जा रहा है की सरकार ने ये कदम अलगाववादियों को खुश करने के लिए उठाया है....लेकिन जिस राज्य की स्थिति इतनी ख़राब है कि.... कभी आतंकी फिदायीन हमले कर देते हैं तो कभी घाटी में प्रदर्शनकारियों से निपटने में राज्य पुलिस के छक्के छूट जाते हैं...वैसे भी दुश्मन देश पाकिस्तान जिसकी नजर हमेशा कश्मीर पर लगी रहती है और वहां आतंक फ़ैलाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है...उस राज्य से मात्र इसलिए सेना हटाई जा रही है...ताकि अलगाववादी खुश हो सकें ...वे अलगाववादी जिनकी न भारत के संविधान में निष्ठा है..और न ही भारत सरकार में...देश के सबसे अशांत राज्य से सेना हटाने का फैसला किसी भी स्थिति में ठीक नहीं कहा जा सकता क्योंकि अगर घाटी में कुछ भी अशांति फ़ैलती है तो विश्व बिरादरी में ये कहा जायेगा कि राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने सरकार असफल रही है...
Monday, January 12, 2009
कब करोगे कार्रवाई
भारत पाकिस्तान के बीच सक बार फिर वर्ड वार शुरू हो गया है...बीस पाक ही दिख रहा है..लेकिन क्या हमारे नेता और हमारी सरकार वास्तव में हमारी सुरक्षा के लिए गंभीर हैं...जवाब होगा नही...जो कुछ भी दिखावा है या हो रहा है...उसके पीछे दो ही कारन हो सकते हैं...एक तो लोकसभा चुनावों की धमक और दूसरा आम जन में बढ़ता असंतोष ...जो भी कदम उठाये जा रहे हैं...वो नाकाफी हैं और अहम अपनी सुरक्षा के लिए अब ख़ुद ही सतर्क होना पड़ेगा...
Thursday, December 11, 2008
ईसाई बन जाओ पचास हज़ार मिलेंगे..
पचास हजार में बनाया जाता है ईसाई, फल फूल रहा धर्मांतरण का धंधा
‘ईसाई बन जाआ॓ पूरे पचास हजार रूपए मिलेंगे।’ उड़ीसा में बेहद गरीब, दलित और आदिवासियों को इतनी ही रकम देकर ईसाई बनाया जाता है। कंधमाल में हिंसा के शिकार हुए तमाम आदिवासी ऐसे ही ईसाई बने हैं। उड़ीसा में धर्मांतरण का धंधा खूब फलफूल रहा है। इस काम में कई एजेंट सक्रिय हैं। एजेंट इसलिए भी धर्मांतरण में रूचि लेते हैं क्योंकि एक दलित या आदिवासी को ईसाई बनाने पर सारे खर्चे के बाद लाख रूपए की मोटी रकम उसे बच जाती है।केंद्रीय मंत्री शरद पवार के नेतृत्व में कंधमाल के राहत शिविरों का जायजा लेने गई श्रीमती मीरा कुमार और पीआर किंडिया की टीम ने धर्मांतरण के गोरखधंधे के बारे में जब अपनी कानों से सुना तो उसे सहज विश्वास ही नहीं हुआ। टीम को यह भी पता चला है कि कोई पचास से ज्यादा संस्थाएं धड़ल्ले से धर्मांतरण के काम में जुटी हैं। जब मंत्रियों ने रूचि दिखाकर इस माजरे को समझना चाहा तो उन्हें बताया गया कि गरीब आदिवासी इस वजह से ईसाई बन जाते हैं कि 50 हजार रूपए मिलने के साथ-साथ उन्हें धर्मांतरण के बाद भी आरक्षण का एवं अन्य सरकारी लाभ पूर्ववत जारी रहते हैं।शिविर में मंत्रियों को इस बारे में भी बताया गया कि कैसे शिक्षा और चिकित्सा जैसे पेशे से जुड़े व्यक्ति एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं। इनमें स्री और पुरूष दोनों हैं जो गरीबों के सामने ईसाई धर्म को इस तरह से पेश करते हैं मानो उनकी सारी मुश्किलों का हल इसको अपनाने भर से निकल आएगा। जब मंत्रियों ने एजेंटों के काम करने की शैली को समझा तो उन्हें मालूम हुआ कि वे उन गरीब और खेतिहर मजदूरों को पकड़ते हैं जो या तो कर्ज में डूबे हैं या जिनका अपने गांव में सम्मान नहीं है। धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं ने गांवों में अपने एजेंट छोड़े हुए हैं। धर्म बदलने वाले दलित-आदिवासी और एजेंटों को हिंदू संगठनों का डर सताता रहता है क्योंकि उनसे जुड़े कार्यकर्ता पकड़ में आने पर इनको जमकर पीटते हैं। कई दलित-आदिवासियों ने बताया कि हिंदू संगठनों के डर से कई व्यक्ति फिर से धर्म बदलकर हिंदू बन जाते हैं।लक्ष्मानंद की सुरक्षा क्यों छीनी ? मंत्रियों की टीम इस बात से भी अंचभित है कि विहिप नेता स्वामी लक्ष्मानंद सरस्वती की सुरक्षा दो दिन पहले किसके कहने पर हटा ली गई थी। दिल्ली से गए मंत्रियों को बहुत कोशिश के बावजूद इसका जवाब नहीं मिल सका। प्रधानमंत्री को दी जाने वाली रिपोर्ट में मंत्रीगण स्वामी लक्ष्मानंद सरस्वती की सुरक्षा हटाए जाने का मुद्दा भी रखने वाले हैं, क्योंकि उनकी हत्या के बाद ही कंधमाल में हिंसा भड़की थी और तमाम लोग बेघर हो गए थे।
‘ईसाई बन जाआ॓ पूरे पचास हजार रूपए मिलेंगे।’ उड़ीसा में बेहद गरीब, दलित और आदिवासियों को इतनी ही रकम देकर ईसाई बनाया जाता है। कंधमाल में हिंसा के शिकार हुए तमाम आदिवासी ऐसे ही ईसाई बने हैं। उड़ीसा में धर्मांतरण का धंधा खूब फलफूल रहा है। इस काम में कई एजेंट सक्रिय हैं। एजेंट इसलिए भी धर्मांतरण में रूचि लेते हैं क्योंकि एक दलित या आदिवासी को ईसाई बनाने पर सारे खर्चे के बाद लाख रूपए की मोटी रकम उसे बच जाती है।केंद्रीय मंत्री शरद पवार के नेतृत्व में कंधमाल के राहत शिविरों का जायजा लेने गई श्रीमती मीरा कुमार और पीआर किंडिया की टीम ने धर्मांतरण के गोरखधंधे के बारे में जब अपनी कानों से सुना तो उसे सहज विश्वास ही नहीं हुआ। टीम को यह भी पता चला है कि कोई पचास से ज्यादा संस्थाएं धड़ल्ले से धर्मांतरण के काम में जुटी हैं। जब मंत्रियों ने रूचि दिखाकर इस माजरे को समझना चाहा तो उन्हें बताया गया कि गरीब आदिवासी इस वजह से ईसाई बन जाते हैं कि 50 हजार रूपए मिलने के साथ-साथ उन्हें धर्मांतरण के बाद भी आरक्षण का एवं अन्य सरकारी लाभ पूर्ववत जारी रहते हैं।शिविर में मंत्रियों को इस बारे में भी बताया गया कि कैसे शिक्षा और चिकित्सा जैसे पेशे से जुड़े व्यक्ति एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं। इनमें स्री और पुरूष दोनों हैं जो गरीबों के सामने ईसाई धर्म को इस तरह से पेश करते हैं मानो उनकी सारी मुश्किलों का हल इसको अपनाने भर से निकल आएगा। जब मंत्रियों ने एजेंटों के काम करने की शैली को समझा तो उन्हें मालूम हुआ कि वे उन गरीब और खेतिहर मजदूरों को पकड़ते हैं जो या तो कर्ज में डूबे हैं या जिनका अपने गांव में सम्मान नहीं है। धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं ने गांवों में अपने एजेंट छोड़े हुए हैं। धर्म बदलने वाले दलित-आदिवासी और एजेंटों को हिंदू संगठनों का डर सताता रहता है क्योंकि उनसे जुड़े कार्यकर्ता पकड़ में आने पर इनको जमकर पीटते हैं। कई दलित-आदिवासियों ने बताया कि हिंदू संगठनों के डर से कई व्यक्ति फिर से धर्म बदलकर हिंदू बन जाते हैं।लक्ष्मानंद की सुरक्षा क्यों छीनी ? मंत्रियों की टीम इस बात से भी अंचभित है कि विहिप नेता स्वामी लक्ष्मानंद सरस्वती की सुरक्षा दो दिन पहले किसके कहने पर हटा ली गई थी। दिल्ली से गए मंत्रियों को बहुत कोशिश के बावजूद इसका जवाब नहीं मिल सका। प्रधानमंत्री को दी जाने वाली रिपोर्ट में मंत्रीगण स्वामी लक्ष्मानंद सरस्वती की सुरक्षा हटाए जाने का मुद्दा भी रखने वाले हैं, क्योंकि उनकी हत्या के बाद ही कंधमाल में हिंसा भड़की थी और तमाम लोग बेघर हो गए थे।
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